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Todays Date
13 November 2019

विवादित जमीन रामलला को दी जाए : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम फैसला: विवादित जमीन रामलला की
सुप्रीम कोर्ट ने 1045 पन्नों में सुनाया ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने सुना दिया ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान को घोषित किया जमीन का मालिक
कोर्ट ने सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन मुहैया करवाने का दिया आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया निर्मोही अखाड़े का दावा
नयी दिल्ली। राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में सुनाए जाने वाले फैसले के मद्देनजर शनिवार को उच्चतम न्यायालय के आसपास सुरक्षा कड़ी कर दी गई। कोर्ट ने कहा कि विवादित जमीन रामलला को दी जाए। सरकार मंदिर निर्माण के लिए नियम बनाएं। राम जन्मभूमि न्यास को विवादित जमीन दे दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ की वैकल्पिक ज़मीन मिले। या तो केंद्र 1993 में अधिगृहित जमीन से दे या राज्य सरकार अयोध्या में ही कहीं दे। कोर्ट ने कहा कि हम अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए मुस्लिम पक्ष को ज़मीन दे रहे हैं। कोर्ट में कहा कि अयोध्या में ही मस्जिद के लिए सुन्नी बफ्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन दी जाए। आपको बता दें कि यह फैसला संविधान की धारा 142 के तहत सुनाया गया। कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार तीन महीने में ट्रस्ट बनाए। टिप्पणी में कोर्ट ने कहा, सुन्नी बफ्फ बोर्ड को वैकल्पिक जमीन देना जरूरी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम विवाद को 2 लोगों के बीच के विवाद के तौर पर देखते हैं। जिसके मुताबिक अब दो पक्षकार रह गए है- सुन्नी बफ्फ बोर्ड और रामलला विराजमान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदुओं के वहां पर अधिकार की ब्रिटिश सरकार ने मान्यता दी। 1877 में उनके लिए एक और रास्ता खोला गया था। अंदरूनी हिस्से में मुस्लिमों की नमाज बंद हो जाने का कोई सबूत नहीं मिला। सुप्रीम कोर्ट ने जजमेंट में कहा कि ढांचे के नीचे पुरानी रचना से हिन्दू का दावा नहीं माना जा सकता है। अयोध्या में राम के जन्म के दावे को किसी ने विरोध नहीं किया, विवादित जगह पर हिन्दू पूजा करते रहे थे। कोर्ट ने कहा कि बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनी थी। नीचे विशाल रचना थी जो कि इस्लामिक नहीं थी। एएसआई की खुदाई में जो कुछ मिला उसे सुप्रीम कोर्ट ने सबूत माना। इसी के साथ रामलला को कानूनी मान्यता भी दी। सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संदेह से परे है और इसके अध्ययन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि राजस्व रिकार्ड के अनुसार विवादित भूमि सरकारी है। सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया निर्मोही अखाड़े का दावा। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने जजमेंट पढ़ते हुए कहा कि मस्जिद कब बनी इससे फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति की आस्था दूसरे व्यक्ति शिया वक्फ बोर्ड का दावा एकमत से खारिज, सीजेआई गोगोई ने कहा कि हमने 1946 के फैजाबाद कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली शिया वक्फ बोर्ड की सिंगल लीव पिटिशन को खारिज करते हैं। इस दौरान उन्होंने कहा कि 1949 में मूर्तियां रखी गईं।
वर्षों पुराने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। फैसले के साथ ही अब इस विवाद का भी पटाक्षेप हो गया है। यह पूरा फैसला 1045 पेज का है। अपने इस फैसले में कोर्ट ने रामलला विराजमान को इस जमीन का मालिक घोषित करते हुए कहा कि एक ट्रस्ट का गठन कर मंदिर बनाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। इसके अलावा कोर्ट ने सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन मुहैया करवाने का भी आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह जमीन कहां दी जाएगी इसको उत्तर प्रदेश की सरकार तय करेगी। यह पूरा मामला 2.77 एकड़ की विवादित जमीन का था। जबकि कोर्ट ने दूसरे पक्ष की भावनाओं का सम्मान करते हुए उन्हें इससे कहीं अधिक बड़ी भूमि मुहैया करवाने का आदेश दिया है। अपने इस ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा और शिया बोर्ड की याचिका खारिज कर दिया। निर्मोही अखाड़े ने अपनी याचिका में विवादित जमीन का कब्जा और प्रबंधन का अधिकार मांगा था। हालांकि कोर्ट ने मंदिर के निर्माण के लिए बनने वाले न्यास में उन्हें शामिल किया गया है। वहीं शिया बोर्ड ने अपनी याचिका में कहा था कि यहां पर स्थित मस्जिद शिया समुदाय ने बनाई थी लिहाजा इसको सुन्नी बोर्ड को नहीं दिया जा सकता है।सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस लिहाज से भी बेहद खास है क्योंकि 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा को एक तिहाई जमीन का मालिक बनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बाबर के समय में उसके करीबी मीर बाकी ने ही मस्जिद बनवाई थी। इसमें 22-23 दिसंबर 1949 की रात को मूर्तियां रखी गईं। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बाबरी मस्जिद का निर्माण खाली जमीन पर न होकर मंदिर था। कोर्ट ने एएसआई की रिपोर्ट को सही माना है। कोर्ट ने एएसआई की रिपोर्ट को बड़ा सुबूत माना है। सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि इसमें कोई विवाद नहीं है कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित ढांचे को गिराए जाने की घटना को गलत बताया। कोर्ट का यह फैसला इसलिए भी ऐतिहासिक रहा क्योंकि यह एकमत से लिया गया। पांच जजों की पीठ में शामिल किसी भी जज का फैसला अलग नहीं था। कोर्ट ने बेहद स्पष्टतौर पर कहा कि विवादित जमीन केवल आस्था की वजह से किसी को नहीं सौंपी है बल्कि इसके ठोस सुबूत हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि मुस्लिम पक्ष विवादित जमीन पर एकाधिकार का दावा साबित करने में नाकाम रहा है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि दस्तावेजों के आधार पर कहा कि 1885 से पहले हिंदू विवादित ढांचे के बाहरी अहाते में स्थित राम चबूतरा और सीता रसोई में पूजा करते थे। देश के सबसे बड़े और संवेदनशील मामले में सर्वोच्च न्यायालय में 40 दिन चली लंबी सुनवाई में वकीलों के बीच बहस देवता की परिभाषा से लेकर विवादित संपत्ति के नष्ट हो जाने पर मालिकाना हक के दावे के मायनों तक पहुंची। हिंदू पक्ष की ओर से देश की सबसे बड़ी अदालत में विवादित भूमि को भगवान श्रीराम का जन्मस्थान बताते हुए उस स्थान को लेकर अगाध आस्था की दलीलें दी गईं।

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